शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

प्रकृति और स्त्री



प्रकृति और स्त्री
स्त्री और प्रकृति
कितना साम्य ?
दोनों में ही जीवन का प्रस्फुटन
दोनों ही जननी
नैसर्गिक वात्सल्यता का स्पंदन,
अन्तःस्तल की गहराइयों तक,
दोनों को रखता एक धरातल पर ।
दोनों ही करूणा की प्रतिमूर्ति
बिरले ही समझ पाते जिस भाषा को
दोनों ही सहनशीलता की पराकाष्ठा दिखातीं
प्रेम लुटातीं उन पर भी,
जो दे जाते आँसू इन्हें,
आहत कर जाते,
छलनी बना देते इनके मन को,
कुचल जाते, रौंद जाते इनके तन बदन को,
दुनियाँ की स्वार्थलिप्सा का शिकार
बनतीं बार-बार
लेकिन माफ़ कर जातीं हर बार
गफ़लत में जी रही दुनियाँ,
ये नहीं समझ पा रही
जब जागेंगीं,
दोनों, जननी और जन्मभूमि,
स्त्री और प्रकृति
दिखा देंगीं अपना रूप,
महिषासुर मर्दिनी का
करेंगी संहार असुरता का, क्रूरता का
करा देंगी साक्षात्कार पीड़ा के उस दंश का, जो
मिलता रहा आजीवन इन्हें, अपनों से ही ।

 मोहिनी चोरडिया 

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

मेरा मन और मुस्कान

मेरे भीतर एक आकाश
कई सूर्य ,कई चन्द्र ,कई आकाशगंगाएं
तारों की झिलमिलाहट
उष्णता ,शीतलता ,धवलता कलुषता भी
संवेग ,आवेग, आवेश का फैलाव
तो
प्यार, प्रेम, सुखऔर
आनंद की लहर भी अंदर
इस आकाश से रूबरू होने की
कोशिश में लगी हूँ
बीत रहा है जीवन  दौड़ते भागते
और
जीवन की इस दौड़ में
धीरे-धीरे सब खुल रहे हैं
सामने आ रहे हैं
एक दुसरे पर
हावी भी हो रहे हैं
कौन जीतेगा ?
मैनें मन को कहा
धीरे से,
दुलार से ,
बस एक मुस्कान !
पिघल जायेंगें सब
शांत  हो जायेंगें
जीत जाएगा जीवन |

मोहिनी चोरडिया